ममता
धरणी धरा पड़ा, धूमिल होत जात है!
ममत्व के मिठास भी खट्ठास होत जात है!!
प्रेम के प्यास में, प्यारी पल-पल तड़प रही!
माँ, बहन बेटी बहू, बेचैन हरदम दिख रही!!
प्यार से पाला जिसे,वो लाल कही खो गया !
है वो यहीं अभी , संस्कार कही खो गया !!
नौ महीने नौ करम के ,क्या दिन वो आसान थे!
या दिन था वो जन्म के, क्या दिन वो आसान थे!!
दूध पिलाना रात-रात में,क्या रात वो आसान थे!!!
जान लो अनजान सब
बाँट लो अब ज्ञान सब
न दिन-रात वो आसान थे, न माह वो आसान थी
पाने के प्रेम में, ममता ममत्व को भा गई
कर गई आसान सब
!! माँ मुझे आज भी बेटा , बाबू , बेटी बुला रही!!
ममता के मूरत माँ, कई रूप में दिखा गई!
माँ, बहन, बेटी,बहू, सब रूप है यही-यहीं!!
ममता कही गिड़गिड़ा रही, महिला दिवस मनाया हम!!
छोड़ ओछ सोंच,साँच आँच में तपना तुझे जरूरी है!
जरूरी है जानो कष्ट क्रंदन की!!
जब दूर-दूर कहे तुझे,दूसरा तुम्हे बुलायेगा!
एक बार सोचो सभी…..
प्यार के बदले तुम्हे डांट-डपट सुनायेगा!!
और सुनो……..
दूसरा कहे, कहकर तुम्हे ठुकरायेगा!!!
तो आपही बताओ……
!!!जीवन जीने में कहाँ मजा आएगा!!!
सुरेंद्र सिंह चेरो
MBA in Rural Management
Indian Institue of Health Management University, Jaipur
7979749288ममता by सुरेन्द्र कुमार सिंह
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