शनिवार, 11 अप्रैल 2020

The Duplicate Development ( DD) by Surendra Kumar Singh


The Duplicate Development

जब मन ही हो खाली!
क्या दशहरा, क्या दीवाली!!
           भोजन दो जून का है नहीं!
           धरती खो गई और कहीं!!
अपने पर न अपना जोर !
क्या करें अब करके शोर!!
           जंगल नहीं,धरती गयी,गया सुख सब पानी!
           पहचान भी बची नहीं,यही है अपनी कहानी!!
बहुएँ ठन के , खुशी मन से ,खेतो पर इतराती थी!
देख बहू के रंग -ढंग पे,सासु मन ही मन मुस्काती थी!!
           बचा कहाँ पिता ख्याल से
           खेत सब बीच बाँट जाएगा!
           रही कसर अपनी जंगल से
           वह भी पूरा तो हो जाएगा!!
अफ़्सोस……………
                                               खेत – खेप में गई हाँथ से
                                           पिता बैठा,हाथ धरी माथ पे
भाई ये हस्र है पुराना, कहानी बड़ी पुरानी है!
जंगल नहीं धरती गई,गया सुख सब पानी है!!
पहचान तो बची नही,अपनी तो यही कहानी है!!!
I have tried to frame the feelings of those who have been looted and misplaced for the sake of the Development (so-called DD,i.e. Duplicate Development)which really doesn’t mean for them. (The Tribal or Forest Dwellers)
सुरेंद्र सिंह चेरो
7979749288

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

ममता by Surendra Kumar Singh



ममता

                    धरणी धरा पड़ा, धूमिल होत जात है!

                    ममत्व के मिठास भी खट्ठास होत जात है!!


प्रेम के प्यास में, प्यारी पल-पल तड़प रही!

माँ, बहन बेटी बहू, बेचैन हरदम दिख रही!!

                  प्यार से पाला जिसे,वो लाल कही खो गया !


                 है वो यहीं अभी , संस्कार कही खो गया !!



नौ महीने नौ करम के ,क्या दिन वो आसान थे!

या दिन था वो जन्म के, क्या दिन वो आसान थे!!

दूध पिलाना रात-रात में,क्या रात वो आसान थे!!!

             जान लो अनजान सब


             बाँट लो अब ज्ञान सब



न दिन-रात वो आसान थे, न माह वो आसान थी

पाने के प्रेम में, ममता ममत्व को भा गई


कर गई आसान सब
                                      !! माँ मुझे आज भी बेटा , बाबू , बेटी बुला रही!!

               ममता के मूरत माँ, कई रूप में दिखा गई!

            माँ, बहन, बेटी,बहू, सब रूप है यही-यहीं!!

                                     मर्महीन मर्द हम,मर्म न जान पाएँ हम!

                              ममता कही गिड़गिड़ा रही, महिला दिवस मनाया हम!!



              छोड़ ओछ सोंच,साँच आँच में तपना तुझे जरूरी है!

              जरूरी है जानो कष्ट क्रंदन की!!

                जब दूर-दूर कहे तुझे,दूसरा तुम्हे बुलायेगा!


एक बार सोचो सभी…..

प्यार के बदले तुम्हे डांट-डपट सुनायेगा!!

            और सुनो……..



दूसरा कहे, कहकर तुम्हे ठुकरायेगा!!!

तो आपही बताओ……

!!!जीवन जीने में कहाँ मजा आएगा!!!

सुरेंद्र सिंह चेरो
MBA in Rural Management
Indian Institue of Health Management University, Jaipur
7979749288ममता by सुरेन्द्र कुमार सिंह

चेरो जनजाति का पंचायती व्यवस्था -'भैयारी (बरियारी) पंचायत'

खंड-२   परिचय   अन्य जनजातियों के भांति चेरो जनजाति में भी स्वशासन व्यवस्था होती है जिसे भैयारी पंचायत कहते हैं । परंतु चेरों की पंचायती व्य...