The Duplicate Development
जब मन ही हो खाली!
क्या दशहरा, क्या दीवाली!!
भोजन दो जून का है नहीं!
धरती खो गई और कहीं!!
अपने पर न अपना जोर !
क्या करें अब करके शोर!!
जंगल नहीं,धरती गयी,गया सुख सब पानी!
पहचान भी बची नहीं,यही है अपनी कहानी!!
बहुएँ ठन के , खुशी मन से ,खेतो पर इतराती थी!
देख बहू के रंग -ढंग पे,सासु मन ही मन मुस्काती थी!!
बचा कहाँ पिता ख्याल से
खेत सब बीच बाँट जाएगा!
रही कसर अपनी जंगल से
वह भी पूरा तो हो जाएगा!!
अफ़्सोस……………
खेत – खेप में गई हाँथ से
पिता बैठा,हाथ धरी माथ पे
भाई ये हस्र है पुराना, कहानी बड़ी पुरानी है!
जंगल नहीं धरती गई,गया सुख सब पानी है!!
पहचान तो बची नही,अपनी तो यही कहानी है!!!
I have tried to frame the feelings of those who have been looted and misplaced for the sake of the Development (so-called DD,i.e. Duplicate Development)which really doesn’t mean for them. (The Tribal or Forest Dwellers)
सुरेंद्र सिंह चेरो
7979749288